मुंबई: निर्देशक निखिल आडवाणी की नई श्रृंखला ‘द रिवोल्यूशनरीज’ स्वतंत्रता आंदोलन के उन युवाओं को केंद्र में लाती है जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र रास्ता चुना था। यह परियोजना संजीव सान्याल की पुस्तक ‘रिवोल्यूशनरीज: द अदर स्टोरी ऑफ हाउ इंडिया वॉन इट्स फ्रीडम’ से प्रेरित है, लेकिन पर्दे के लिए इसकी घटनाओं और पात्रों में कई रचनात्मक बदलाव किए गए हैं।
निखिल के अनुसार, इस विषय का विचार ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ के लिए शोध करते समय आया। उन्हें एहसास हुआ कि आजादी की लड़ाई के कई प्रसंग लोकप्रिय इतिहास में कम जगह पा सके हैं। वह समझना चाहते थे कि उधम सिंह, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुभाष चंद्र बोस जैसे लोगों तक विद्रोह की चिंगारी कैसे पहुंची और सत्याग्रह के समानांतर चल रही दूसरी धारा ने युवाओं को किस तरह प्रभावित किया।
निर्देशक ने साफ किया कि श्रृंखला पुस्तक का दृश्य-दर-दृश्य रूपांतरण नहीं है। ऐतिहासिक आधार को बनाए रखते हुए उड़ान, पीछा, प्रेम और संगीत जैसे सिनेमाई तत्व जोड़े गए हैं। इसमें नौ गीत हैं और कुछ संबंधों को कहानी की भावनात्मक धुरी बनाने के लिए बदला गया है। प्रतिभा सान्याल से जुड़ा प्रेम प्रसंग भी इसी रचनात्मक स्वतंत्रता का उदाहरण है, क्योंकि ऐतिहासिक समय में उनकी वास्तविक उम्र उस चित्रण से मेल नहीं खाती थी।
कुछ बंद कमरों की बातचीत और संवादों का कोई पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। ऐसे हिस्सों में लेखकों ने ज्ञात राजनीतिक परिस्थितियों और पात्रों के विचारों के आधार पर दृश्य गढ़े। इसी तरह कुछ एक्शन दृश्य काल्पनिक हैं, जबकि उनके पीछे की घटनाएं—बम हमला, अंग्रेजों की वांछित सूची में आना और बच निकलने की कोशिश—ऐतिहासिक प्रसंगों पर आधारित बताई गई हैं।
श्रृंखला के केंद्र में चार ऐसे युवा हैं जो अलग पृष्ठभूमि से आकर एक साझा उद्देश्य के लिए जुड़ते हैं। निर्माता केवल उनकी क्रांतिकारी गतिविधियां दिखाने के बजाय आपसी रिश्तों, भय, प्रेम, मतभेद और जुनून को भी कहानी का हिस्सा बना रहे हैं। निखिल के लिए इस परियोजना का मुख्य भाव ‘जुनून’ है—देश को आजाद देखने की तीव्र इच्छा और उसके लिए निजी जीवन दांव पर लगाने का साहस।
भुवन बाम, रोहित सराफ और गुरफतेह पीरजादा जैसे कलाकारों वाली यह श्रृंखला इतिहास और मनोरंजन के बीच संतुलन की परीक्षा होगी। रचनात्मक बदलाव दर्शकों को कहानी से जोड़ सकते हैं, लेकिन वास्तविक और काल्पनिक हिस्सों का फर्क स्पष्ट रखना भी जरूरी है। निखिल ने माना है कि कुछ दृश्य और रिश्ते कल्पना से बने हैं, जबकि बड़े घटनाक्रमों की नींव ऐतिहासिक सामग्री पर रखी गई है।
