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माँ का पहला हस्ताक्षर: धूपगढ़ के छोटे पुस्तकालय की मार्मिक कहानी

जिस दिन हस्ताक्षर की जगह अंगूठा लगा

धूपगढ़ के छोटे कस्बे में डाकखाने के पीछे एक घर था, जिसकी छत बारिश में टपकती और गर्मी में तवे जैसी तपती थी। उसी घर में तारा अपनी माँ सुशीला, पिता मोहन और छोटी बहन चंदा के साथ रहती थी। मोहन बस अड्डे पर चाय बेचते थे। सुशीला घरों में सिलाई करती थीं। तारा बारहवीं में थी और उसे किताबों से ऐसा लगाव था कि पुराने अखबार की खाली जगह पर भी वह नए शब्द लिख लेती। एक दिन बैंक में बचत खाते का फॉर्म भरते हुए माँ ने फिर अंगूठे पर नीली स्याही लगाई। बाहर आकर उन्होंने अपनी हथेली पल्लू में छिपा ली। तारा ने पूछा तो माँ ने बस इतना कहा, “तुम अपना नाम खुद लिखना। दुनिया के सामने अपना हाथ छिपाना न पड़े।” तारा ने पहली बार देखा कि शिक्षा की कमी केवल परीक्षा में अंक कम नहीं करती; वह किसी इंसान की आवाज़ भी धीमी कर देती है।

एक छूटी हुई किताब

गाँव के प्राथमिक विद्यालय में पुरानी अलमारी थी। बरसात के बाद छत टूटने लगी तो पुस्तकों को बोरे में भरकर बंद कमरे में रख दिया गया। शिक्षक बदली पर चले गए। बच्चे अब स्कूल की दीवार के पास खेलते, पर कोई वहाँ किताब लेने नहीं जाता। तारा ने प्रधानाध्यापक से पूछा कि किताबें घर ले जाने को मिल सकती हैं क्या। जवाब मिला, “रिकॉर्ड बनाओ, जिम्मेदारी लो, फिर सोचेंगे।” उसका पहला खयाल था कि कौन इतने कागज सँभालेगा। उसी शाम उसने माँ को बैंक की पासबुक उलटी पकड़े देखा। माँ ने जमा रकम पूछने के लिए पड़ोस की लड़की को बुलाया था। तारा ने अलमारी की चाबी माँगने का फैसला उसी रात किया। उसने अपनी पुरानी कॉपी में पुस्तक का नाम, लेने वाले का नाम और लौटाने की तारीख लिखने के लिए तीन खाने बनाए।

खाली डाकखाना, नई शुरुआत

डाकखाने की पुरानी इमारत में एक बरामदा कई वर्षों से खाली पड़ा था। वहाँ लकड़ी की दो टूटी मेजें और धूल से भरी खिड़कियाँ थीं। सेवानिवृत्त डाकिया बशीर चाचा रोज वहाँ बैठकर अपने पौधों को पानी देते। तारा ने उनसे पूछा कि वह दो घंटे के लिए बरामदा साफ करके बच्चों को पढ़ा सकती है क्या। चाचा मुस्कराए, “बरामदा मेरा नहीं, मोहल्ले का है; पहले मालिक से लिखित इजाजत ले लो।” तारा को लगा कि बड़ी बात केवल उत्साह से नहीं चलती। उसने पंचायत से अनुमति ली, विद्यालय से पुस्तकें उधार लेने का पत्र लिया और तीन मित्रों के साथ बरामदा साफ किया। पहली शाम चार बच्चे आए। उनमें एक तारा की बहन थी और दूसरे दो बस अड्डे पर चाय के गिलास धोने वाले भाई। चौथा बच्चा अपनी किताब घर भूल आया था।

सिखाने से पहले सुनना

तारा ने पहले दिन सबको अक्षर पढ़ाना शुरू किया। दस मिनट बाद बच्चों की निगाहें बाहर भागने लगीं। बशीर चाचा ने उसे धीरे से कहा, “इनसे पूछो कि ये क्या जानना चाहते हैं।” एक बच्चा बस का नंबर पढ़ना चाहता था, ताकि गलत बस में न चढ़े। दूसरा मजदूरी का हिसाब समझना चाहता था, क्योंकि उसके पिता दिनभर का जोड़ दूसरों पर छोड़ देते थे। चंदा को अपनी कहानी लिखनी थी। तारा ने अगले दिन बस के पुराने टिकट, खाली रसीदें और फल की कीमत वाले कागज जुटाए। अक्षर अचानक बोझ नहीं रहे; वे रास्ता बताने लगे। उसने यह भी सीखा कि किसी को मूर्ख कह देने से वह नहीं सीखता। धैर्य, अपने अनुभव से जुड़ा उदाहरण और गलती करने की जगह—यही अच्छी पढ़ाई की शुरुआत है।

माँ की पहली रेखा

सुशीला रात को सिलाई की मशीन बंद करके बरामदे तक आतीं, पर भीतर बैठने से झिझकतीं। कहतीं, “इस उम्र में क्या सीखूँगी? बच्चों की हँसी उड़ेगी।” तारा ने उनके सामने पेंसिल रखी और अपना नाम नहीं, माँ का नाम लिखना शुरू किया। सु, शी, ला—तीन टुकड़ों में बँटे अक्षर जैसे किसी पुराने गीत की धुन बन गए। पहले दिन रेखा काँपी। दूसरे दिन ‘शी’ उल्टा हो गया। तीसरे दिन माँ ने कॉपी बंद कर दी, “मेरे बस का नहीं।” तारा ने कॉपी नहीं छीनी। उसने अपनी पुरानी गणित की कॉपी दिखाई, जिसमें लाल निशान भरे थे। “गलती पढ़ाई का सबूत है, हार का नहीं,” उसने कहा। अगले सप्ताह सुशीला ने कपड़े के टुकड़े पर अपना नाम कढ़ाई से बनाया। सिलाई के धागे ने पेंसिल से पहले उनके हाथ को भरोसा दिया।

जब घर का हिसाब बिगड़ा

एक महीने बाद बरामदे में पंद्रह बच्चे और छह बड़े आने लगे। तभी मोहन को बुखार हुआ। चाय की दुकान चार दिन बंद रही। घर की बचत दवाई और किराए में चली गई। तारा को सुबह दुकान सँभालनी पड़ी और शाम की कक्षा छूटने लगी। उसे गुस्सा आया कि जिस काम के लिए सब उसकी तारीफ करते थे, वही काम घर की जरूरत के सामने छोटा पड़ गया। बशीर चाचा ने कहा, “सेवा का मतलब अपना घर जलाकर दूसरे को रोशनी देना नहीं। काम बाँटो।” तारा ने बच्चों को समूह बनाए। दसवीं की रीना ने छोटी कक्षा संभाली; दुकानदार कमलेश ने पुराना ट्यूबलाइट ठीक किया; चंदा ने पुस्तकों का रिकॉर्ड लिखा। तारा को समझ आया कि टिकाऊ भलाई एक नायक की थकान पर नहीं, कई लोगों की जिम्मेदारी पर खड़ी होती है।

एक खोया हुआ लिफाफा

बरामदे में आने वाली वृद्धा रुक्मिणी के नाम एक सरकारी पत्र आया। वह उसे कई दिनों तक ब्लाउज में दबाए रहीं, क्योंकि पढ़ने के लिए किसी भरोसेमंद व्यक्ति का इंतजार था। पत्र किसी राहत योजना की अंतिम तारीख का था। तारीख निकल चुकी थी। रुक्मिणी फूट पड़ीं। तारा को सबसे ज्यादा दुख यह हुआ कि वह मदद करने के बावजूद समय पर वहाँ नहीं थी। उस रात उसने नियम बदला: जरूरी पत्र मिलते ही संबंधित व्यक्ति को पढ़कर समझाना, उसके कहे बिना कोई फॉर्म नहीं भरना, और उसकी निजी जानकारी किसी और को न बताना। अगले दिन उसने स्थानीय कार्यालय से अगली आवेदन प्रक्रिया की पक्की जानकारी ली; रुक्मिणी को झूठी आशा नहीं दी। कुछ अवसर वापस नहीं आते, पर ईमानदार साथ से किसी की अगली कोशिश अकेली नहीं रहती।

किताब के बाहर की सीख

बरामदे की दीवार पर तारा ने तीन बड़े कागज लगाए—आज की पढ़ाई, कल का अभ्यास, और किसे किस सहायता की जरूरत है। सहायता वाली सूची में किसी का नाम उसकी अनुमति के बिना नहीं चढ़ता था। बच्चों ने पैसे गिनने के लिए बोतल के ढक्कन जमा किए। माताएँ अपनी खरीदारी की पर्चियों से जोड़-घटाव सीखने लगीं। एक दिन सुशीला ने सिलाई के ऑर्डर की कुल रकम खुद जोड़ी। ग्राहक ने गलती से कम रुपये दिए थे; उन्होंने विनम्रता से हिसाब दिखाया। ग्राहक ने बचे रुपये लौटाए। उस शाम उन्होंने तारा से कहा, “मैं किसी से लड़ना नहीं चाहती थी। बस अपना हिसाब अपनी आँखों से देखना चाहती थी।” तारा ने सोचा, शिक्षा अधिकार जताने की भाषा देती है, और वह भाषा सबसे पहले अपने घर में सुनाई देती है।

बारिश की रात

सितंबर की एक रात तेज बारिश में बरामदे की दीवार से पानी रिसने लगा। नीचे रखी किताबें भीग जातीं, इसलिए बच्चे और बड़े दौड़कर पहुँचे। कोई बोरे लाया, किसी ने मेज पर ईंटें रखीं, किसी ने किताबों को ऊपर चढ़ाया। तारा का स्कूल प्रमाणपत्र भी उसी ढेर में था। वह उसे लेने बढ़ी, फिर रुक गई; सामने रुक्मिणी का पहला पढ़ा हुआ पत्र पानी में भीग रहा था। उसने पत्र और प्रमाणपत्र दोनों उठाए। सुबह तक सब थक गए। कई किताबों के पन्ने फूल गए थे। तारा रो पड़ी। बशीर चाचा ने एक भीगी किताब खोलकर कहा, “इसे सुखाकर पढ़ेंगे। जो फट गई, उसकी कहानी सुनाकर बचाएँगे।” नुकसान को नकारने की जरूरत नहीं थी; उसके बाद साथ बैठकर काम करना जरूरी था।

परीक्षा और एक कठिन चुनाव

बोर्ड परीक्षा से छह सप्ताह पहले तारा के पास एक निजी कोचिंग का प्रस्ताव आया। फीस कम थी, फिर भी घर के लिए भारी। शर्त थी कि वह रोज शाम की कक्षा छोड़कर वहाँ जाए। उसे लगा कि पढ़ना चाहने वाले बच्चों से मुँह मोड़ना स्वार्थ है। माँ ने उसकी कॉपी बंद कर दी और बोलीं, “जिस बेटी ने मुझे पढ़ना सिखाया, उसे अपनी पढ़ाई के लिए अपराधबोध क्यों हो? हम मिलकर बरामदा चलाएँगे।” सुशीला ने बड़े विद्यार्थियों की उपस्थिति देखी, रीना ने बच्चों को पढ़ाया और बशीर चाचा ने किताबें सँभालीं। तारा सप्ताह में एक दिन आती, बाकी समय परीक्षा की तैयारी करती। उसे पहली बार समझ आया कि दूसरों के लिए काम करना और अपने भविष्य को सँवारना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सही जिम्मेदारी वह है जिसे लोग मिलकर निभा सकें।

पहला हस्ताक्षर

परीक्षा के बाद बैंक से फोन आया कि सुशीला को अपनी जमा रकम से जुड़ा एक फॉर्म देखना है। तारा साथ गई, पर इस बार उसने फॉर्म अपने हाथ में नहीं लिया। सुशीला ने नाम, तारीख और रकम धीरे-धीरे पढ़ी। एक शब्द नहीं समझ आया तो कर्मचारी से पूछा। उन्होंने साफ भाषा में दोबारा समझाया। फिर सुशीला ने पेन उठाया। हस्ताक्षर पूरा होने में लंबा समय लगा, जैसे हर अक्षर किसी छोटी पहाड़ी पर चढ़ रहा हो। बाहर निकलते ही उन्होंने पल्लू से हाथ नहीं ढका। उन्होंने रसीद तारा को दिखाकर कहा, “देख, मेरा नाम मेरे हाथ से लिखा है।” तारा ने कुछ कहना चाहा, पर शब्द नहीं मिले। उसे वही दिन याद आया जब माँ ने बैंक के बाहर हथेली छिपाई थी। इस बार उनकी उँगलियों पर स्याही नहीं, भरोसा था।

जिसका नाम सूची में नहीं था

कुछ महीने बाद गाँव में एक नया लड़का आया, इमरान। उसके पास स्कूल छोड़ने का प्रमाणपत्र नहीं था, इसलिए वह चुपचाप बरामदे के बाहर खड़ा रहता। बच्चों ने उसे चोर समझकर अपनी पेंसिलें समेट लीं। तारा ने उन्हें रोका। उसने इमरान से अकेले बात की; लड़का हाल में आए मजदूर परिवार का था और हर कुछ महीनों में जगह बदलनी पड़ती थी। तारा ने विद्यालय से दाखिले के नियम जाने और परिवार को आवश्यक कागज जुटाने में मदद की। वह कोई झूठा प्रमाणपत्र बनाने या तुरंत प्रवेश का वादा करने नहीं गई। तब तक इमरान बरामदे में पढ़ता रहा। बच्चों ने उससे नक्शे पर वे शहर सीखे जहाँ वह रह चुका था। तारा ने कक्षा में कहा, “किसी के पास कागज कम हों तो उसका ज्ञान कम नहीं हो जाता। पहले इंसान को जगह दो, फिर व्यवस्था का रास्ता खोजो।”

एक छोटा-सा उत्सव

साल के अंत में बरामदे में किताबों का मेला लगा। प्रवेश शुल्क नहीं था। हर व्यक्ति ने वह चीज बताई जो उसने सीखी थी। चंदा ने अपनी लिखी कहानी पढ़ी। बस का नंबर सीखने वाले बच्चे ने बिना मदद सही बस पकड़ी और लौटकर सबको बताया। एक पिता ने मजदूरी का हिसाब खुद लगाया। रुक्मिणी ने नया पत्र पढ़ने से पहले चश्मा ठीक किया और बोलीं, “मुझे समय चाहिए, मगर अब डर नहीं लगता।” सुशीला मंच पर नहीं गईं; उन्होंने मेज पर कपड़े की एक पट्टी रखी, जिस पर सबके नाम कढ़े थे। आखिरी कोने में तारा का नाम थोड़ा टेढ़ा था। माँ ने हँसकर कहा, “गलती रहने दी है। याद रहे कि शुरुआत सीधी नहीं होती।” लोग भी हँसे, फिर बहुत देर तक उस पट्टी को देखते रहे।

रोशनी बाँटने का अर्थ

तारा को शहर के कॉलेज में छात्रवृत्ति मिली। जाने से पहले वह अकेली बरामदे में बैठी। दीवार पर पुराने पानी का निशान था, किताबों की रीढ़ अलग-अलग रंग की थी, और रजिस्टर में अब उसके अलावा कई लोगों की लिखावट थी। उसे डर था कि उसके जाने पर सब रुक जाएगा। बशीर चाचा ने रजिस्टर उसकी ओर सरकाया। अगले महीने की जिम्मेदारियों में रीना, सुशीला, कमलेश और इमरान के नाम लिखे थे। “तुमने यहाँ अपना नाम नहीं, रास्ता बनाया है,” उन्होंने कहा। तारा ट्रेन में बैठी तो माँ ने उसके हाथ में कपड़े का वही टुकड़ा रखा। पीछे छोटे अक्षरों में लिखा था: “सीखने की उम्र नहीं होती; सिखाने वाला अकेला नहीं होता।” तारा की आँखें भर आईं। खिड़की के बाहर गाँव पीछे छूट रहा था, पर बरामदे की रोशनी वहीं जल रही थी—ऐसी रोशनी, जिसे किसी एक व्यक्ति के रहने से नहीं, सबके साथ आने से ताकत मिलती है।