मौलिक काल्पनिक कहानी — 11 सितंबर
नगर परिषद के लिफाफे पर लगी लाल मुहर देखकर देव ने सबसे पहले तारीख गिनी। खाली करने के लिए बाईस दिन थे। इतने में दुकान का सामान बिक सकता था, मकान के बंटवारे के कागज पूरे हो सकते थे और वह सोमवार तक शहर की नौकरी पर लौट सकता था। उसे केवल अपने पिता को यह बात समझानी थी कि तैंतालीस साल पुरानी जूते सीने की दुकान अब किसी काम की नहीं रही।
पिता दुकान के बाहर बैठे एक बच्ची की चप्पल में टांका लगा रहे थे। उनकी उंगलियों के जोड़ फूल गए थे। सूई पकड़ते समय अंगूठा कांपता, फिर चमड़े को छूते ही ठहर जाता। बच्ची बार-बार सड़क की ओर देख रही थी। शायद स्कूल की घंटी बजने वाली थी।
“कितना हुआ, काका?” उसने अपनी मुट्ठी खोली। दो सिक्के थे।
“अभी रख ले। अगले हफ्ते दूसरी चप्पल का पट्टा भी दिखा देना।”
देव ने बच्ची के जाते ही लिफाफा मेज पर रख दिया। “इसीलिए तो कहता हूँ, बाबूजी। कमाई कुछ है नहीं, बस रोज बैठना है। मेरे साथ चलिए। रहने को कमरा है, दवा का इंतजाम है। आपको और क्या चाहिए?”
हरिराम ने सूई कपड़े में खोंस दी। उन्होंने लिफाफा पढ़ा, चश्मा उतारा और धीरे से पूछा, “यहाँ जो अधूरे जोड़े रखे हैं, उन्हें कौन लौटाएगा?”
देव को लगा, पिता हमेशा मुख्य बात से बचने के लिए कोई छोटी बात उठा लेते हैं।
पीतल के डिब्बे की पर्चियाँ
अगली सुबह उसने दुकान खाली करने के लिए तीन गत्ते के बक्से लाए। एक पर लिखा—औजार। दूसरे पर—बेचने का सामान। तीसरे पर उसने कुछ नहीं लिखा; बेकार चीजें उसी में डालनी थीं। हरिराम ने पहले दोनों बक्सों को देखा, फिर खाली शब्द वाली जगह पर देर तक उंगली फेरते रहे।
अलमारी के नीचे पीतल का एक डिब्बा मिला। उसमें पुराने नोट नहीं, मोड़ी हुई पर्चियाँ थीं। किसी पर बच्चों के पैरों का नाप था, किसी पर बस अड्डे का नाम, किसी पर केवल “गुरुवार वाली अम्मा” लिखा था। देव ने पूछा, “इतना उधार है?”
“सब उधार नहीं।”
“तो ये कागज क्यों संभाले हैं?”
हरिराम ने एक पर्ची चुनी। उस पर लिखा था—नसीम, नीला बैग, इंटरव्यू। “इसके जूते की एड़ी टूट गई थी। कह रहा था, लौटते समय पैसे दे जाएगा। नौकरी दूसरे जिले में लग गई। उसने महीने भर बाद भेज दिए। पर्ची रह गई।”
देव हंस पड़ा। “पैसे मिल गए तो फेंक देते।”
पिता ने पर्ची मोड़ दी। “उस दिन उसका नाम ठीक से पूछा था। बाद में मिला तो नाम लेकर बुला पाया। आदमी को याद रखना भी काम आता है।”
देव ने डिब्बा फिलहाल औजार वाले बक्से में रख दिया। वह बहस को लंबा नहीं करना चाहता था। सड़क चौड़ी होनी थी। नोटिस में वैकल्पिक जगह के लिए आवेदन का जिक्र था, पर पिता ने महीनों पहले भरा हुआ प्रपत्र अलमारी में ही रख छोड़ा था। उसमें दो दस्तावेज कम थे। देव ने इसे उनकी लापरवाही समझा और जेब में डाल लिया।
नाम से पहले लगा शब्द
दोपहर में स्कूल की वही बच्ची आई। इस बार उसके साथ छोटा भाई था, जो एक पैर ऊपर उठाकर खड़ा था। बच्ची का नाम राधा था। भाई की सैंडल हाथ में लेते हुए हरिराम ने उससे पहाड़ा पूछा। लड़का छह के पहाड़े पर अटक गया तो उन्होंने कहा, “चल, आज बस यहीं तक। बाकी कल सुनाना।”
देव ने सैंडल ठीक होने पर कहा, “पैसे नहीं हैं तो घर में बता देना। रोज ऐसे कैसे चलेगा?”
राधा का चेहरा बुझ गया। उसने भाई का हाथ पकड़ा। “माँ ने पैसे देने को ही कहा है। काम से आएंगी तो ले आऊंगी।”
उनके जाने के बाद पिता कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, “वह यह बताने नहीं आई थी कि उसके पास पैसे नहीं हैं। चप्पल ठीक कराने आई थी।”
“मैंने गलत क्या कहा?”
“पूछ सकता था, कितने दिन में देना ठीक रहेगा।”
देव ने पहली बार गौर किया कि पिता ग्राहक की जेब का अनुमान लगाकर उसके लिए कोई नाम नहीं चुनते। उनके यहाँ सफाई का काम करने वाली विमला भी विमला जी थीं और बड़े मेडिकल स्टोर के मालिक भी सुरेश जी। किसी की कमी उसके नाम से पहले नहीं लगती थी।
उसे अपना बचपन याद आया। सातवीं कक्षा में एक लड़के ने सबके सामने कहा था, “तेरे पापा जूते जोड़ते हैं।” देव उस दिन पिता की दुकान के सामने से दूसरी गली में मुड़ गया था। शाम को पिता ने कुछ नहीं पूछा। केवल अगले दिन उसका स्कूल बैग धोकर धूप में डाल दिया था।
वह स्मृति इतने वर्षों तक उसके भीतर थी, पर आज उसने पहली बार सोचा कि पिता ने शायद उसे दूसरी गली में मुड़ते देख लिया होगा।
एक छोटी-सी दरार
शाम को हरिराम घर आने में देर कर गए। देव लेने पहुंचा तो देखा, दुकान की लकड़ी की बेंच उलटी पड़ी है। पिता उसे जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। एक पाये में लंबी दरार थी। देव झल्लाया, “दुकान ही टूटने वाली है। अब इस बेंच पर मेहनत क्यों?”
“जूता उतरवाकर किसी को खड़ा रखूँ?”
“नई खरीद देंगे।”
“खरीद देंगे तो अच्छा है। तब तक इसे गिरने तो न दूँ।”
देव ने बेंच पकड़ ली। बरसों बाद दोनों ने साथ कोई काम किया। पिता ने बताया कि लकड़ी के रेशे की दिशा देखकर कील लगानी चाहिए। देव ने दूसरी कील तिरछी ठोक दी। हरिराम ने उसे डांटा नहीं, केवल हथौड़े की पकड़ बदलवाई। उस छोटे से काम में एक घंटा लगा। बाहर दुकानें बंद होती रहीं और भीतर पिता-पुत्र के बीच कई वर्षों से बंद एक बातचीत धीरे-धीरे खुलने लगी।
देव ने पूछ ही लिया, “आप मेरे साथ क्यों नहीं चलना चाहते?”
हरिराम ने हथौड़ा नीचे रखा। “चलूँगा। पर सुबह उठकर क्या करूँगा, यह भी सोच। तेरे घर का रास्ता पता है, वहाँ अपने दिन का रास्ता नहीं पता।”
देव के पास इस प्रश्न का तैयार उत्तर नहीं था। उसने पिता के लिए एक कमरे की व्यवस्था की थी। दिन की व्यवस्था नहीं की थी।
बारिश वाली शाम
तीसरे दिन तेज बारिश हुई। दुकान के पीछे की नाली बंद थी। पानी भीतर आने लगा तो देव बक्से उठाकर मेज पर रखने लगा। हरिराम ने सबसे पहले ग्राहकों के जूते उठाए। अपनी चादर भीगने दी, पर कपड़े के छोटे जूतों का जोड़ा सिर के ऊपर कर लिया।
उसी समय राधा भीगती हुई आई। उसके हाथ में एक थैली थी। “माँ ने भेजे हैं,” उसने कहा। भीतर बारह रुपये थे और कागज में लिपटी दो रोटियाँ। “आप लोगों ने दुकान बंद नहीं की, तो बोलीं खाना यहीं दे आ।”
देव को पैसे लेने में झिझक हुई। सुबह तक जिस भुगतान की चिंता थी, अब वही सिक्के भारी लग रहे थे। उसने कहा, “रहने दो, जरूरत नहीं।”
राधा ने थैली वापस नहीं ली। “माँ ने कहा है, काम करवाया है।”
हरिराम ने पैसे गिने, चार रुपये लौटाए और रोटियाँ डिब्बे में रख दीं। “माँ से कहना, सब्जी बहुत दिन बाद खाई उनकी।”
बच्ची चली गई तो देव ने पूछा, “आप इन्हें जानते हैं?”
“तेरी माँ बीमार थी, तब विमला रोज रोटी दे जाती थी। तू शहर में परीक्षा दे रहा था। मैंने तुझे नहीं बताया, तू लौट आता।”
देव की माँ को गए आठ साल हो चुके थे। उसे याद था कि उन दिनों पिता फोन पर कहते थे, खाना खा लिया है। उसने कभी यह नहीं पूछा था कि किसने बनाया। आज उस सामान्य से वाक्य के पीछे एक स्त्री का चूल्हा, उसकी मजदूरी के बाद की थकान और चार लोगों के लिए बने आटे से निकली दो अतिरिक्त रोटियाँ दिखाई देने लगीं।
बारिश थमने तक देव मेज पर बैठा रहा। पिता ने उसे रोटी दी। दोनों ने बिना कुछ कहे खाया। उस शाम देव ने दया और रिश्ते के बीच का अंतर महसूस किया। उसने जिन लोगों को लेने वाला समझा था, वे किसी और दिन देने वाले रहे थे।
गलती की रसीद
अगले दिन वह राधा के घर गया। विमला दरवाजे पर कपड़े निचोड़ रही थीं। देव ने कहा, “कल मैंने बच्चों से पैसे के बारे में जिस तरह बात की, वह ठीक नहीं था।”
विमला ने काम रोक दिया। वह लंबी सफाई की प्रतीक्षा नहीं कर रही थीं। देव ने भी कोई नहीं दी। उसने बस पूछा, “राधा से माफी मांग सकता हूँ?”
राधा भीतर से आई। देव ने वही बात उससे दोहराई। बच्ची ने सिर हिला दिया और अपनी कॉपी मेज से उठा ली। माफी मिलते ही सब पहले जैसा नहीं हुआ; वह अब भी संकोच में थी। देव समझ गया कि अपने व्यवहार को ठीक साबित करने से अधिक समय दूसरे को सहज होने देने में लगता है।
वापस दुकान पर आया तो उसने खाली बक्से पर लिखा—पूछकर तय करना। पिता मुस्कराए। “अब यह सबसे देर में भरेगा।”
“ठीक है,” देव ने कहा। “मेरे पास तीन दिन और हैं।”
उसने दफ्तर से छुट्टी बढ़वाई। फिर परिषद में पिता के कागज पूरे कराए। नई जगह की फीस और नियम साफ लिखवाए। कोई चमत्कार नहीं हुआ। आवेदन पहली खिड़की पर जमा नहीं हुआ, पहचान की प्रति दोबारा देनी पड़ी और आवंटन की तारीख भी तुरंत नहीं मिली। लेकिन इस बार अधूरा प्रपत्र अलमारी में वापस नहीं गया। पिता अपने आवेदन की रसीद लेकर लौटे।
छत छोटी थी, जगह पूरी
सड़क चौड़ी करने के काम से पहले दुकान खाली करनी ही पड़ी। मोहल्ले के सामुदायिक भवन की समिति ने नियमों के अनुसार किराए पर एक छोटा कोना देने की सहमति दी, जब तक वैकल्पिक स्थान की प्रक्रिया पूरी हो। देव ने किराया चुकाने की बात की। हरिराम ने कहा, “पहले तीन महीने तू मदद कर दे। आगे दुकान का हिसाब देखकर बात करेंगे।”
इस बार बेटे ने उनकी बात काटकर “सब मैं देख लूँगा” नहीं कहा। दोनों ने खर्च लिखे। काम के घंटे घटाए। सुबह की दवा, दोपहर का विश्राम और हफ्ते की छुट्टी तय हुई। उंगलियों के दर्द के लिए डॉक्टर से मिलने का समय लिया गया। पिता को काम करते रहने देना उनके दर्द को अनदेखा करना नहीं था। उनके साथ मिलकर ऐसा दिन बनाना था जिसमें काम भी हो और शरीर को राहत भी मिले।
पुरानी दुकान के आखिरी दिन कई लोग आए। कोई समारोह नहीं था। सुरेश जी ने बिजली का तार समेटने में मदद की। विमला झाड़ू ले आईं। नसीम, जो अब महीने में एक बार घर आता था, भारी मेज उठाने लगा। देव ने पीतल का डिब्बा अपने हाथ में रखा।
सब सामान निकल गया तो हरिराम दरवाजे पर खड़े रहे। दीवार पर धुएं का निशान था, जहाँ कभी देव की माँ चाय की छोटी केतली रखती थीं। पिता ने उस जगह को छुआ और हाथ वापस कर लिया। बेटे ने उन्हें जल्दी नहीं की। पहली बार उसे समझ आया कि किसी जगह को छोड़ना केवल ताला लगाने जितना छोटा काम नहीं होता।
नए कोने में वही जोड़ी हुई बेंच रखी गई। देव ने ऊपर नया बोर्ड लगाने का प्रस्ताव दिया। पिता ने पुराने बोर्ड से धूल पोंछी। अक्षर फीके थे, पर नाम पढ़ा जा सकता था—हरिराम जूता मरम्मत। नीचे छोटे अक्षरों में देव ने फोन नंबर लिख दिया।
वापसी का नया रास्ता
शहर लौटने से पहले देव ने राधा को भाई के साथ आते देखा। बच्ची ने बेंच पर बैठकर चप्पल खोली और पूछा, “काका, यहाँ भी पहाड़ा सुनाना पड़ेगा?”
“हाँ,” हरिराम बोले, “किराया बढ़ा है, अब सात का सुनना पड़ेगा।”
राधा हंस पड़ी। देव भी हंसा। कई दिनों से रुकी हुई बच्ची की सहज हंसी लौट आई थी।
बस अड्डे पर पिता उसे छोड़ने आए। देव ने उनका हाथ थामा। चमड़े, धागे और वर्षों की मेहनत से सख्त हुई हथेली उसकी हथेली में थी। उसने धीमे से कहा, “स्कूल में एक दिन मैं आपकी दुकान के सामने से नहीं निकला था।”
हरिराम ने सड़क की ओर देखा। “याद है।”
देव की आंखें भर आईं। “आपने पूछा क्यों नहीं?”
“सोचा, बड़ा होगा तो अपना रास्ता समझेगा।” पिता थोड़ा रुके। “बुरा लगा था। पर तू रोज तो नहीं मुड़ा था।”
बस आ गई। देव सीढ़ी पर चढ़कर फिर उतरा और पिता को गले लगा लिया। वह कोई बड़ा वादा नहीं करना चाहता था जिसे अगले व्यस्त सोमवार को भूल जाए। उसने केवल कहा, “रविवार सुबह फोन करूँगा। रसीद का अगला काम भी साथ देखेंगे।”
अगले रविवार उसने सच में फोन किया। इस बार पहला सवाल दवा या पैसे का नहीं था। उसने पूछा, “बाबूजी, आज दुकान पर कौन आया?”
उधर से हरिराम की आवाज में हल्की चमक आई। “आज नसीम आया था। अपने बेटे के स्कूल के जूते लाया। उसका नाम अयान है। लिख ले, फिर भूल जाएगा।”
देव ने पास पड़ी डायरी खोली और नाम लिख लिया।
कई महीनों बाद जब पिता को नई जगह मिल गई, देव ने एक छोटा पीतल का डिब्बा खरीदा। उसमें उसने पहली पर्ची रखी—रविवार, बाबूजी से बात। उसके नीचे कोई रकम नहीं थी। इस बार वह जानता था कि कुछ हिसाब पैसे चुकाने से पूरे नहीं होते। उन्हें पूरा करने के लिए समय देना पड़ता है, ध्यान से सुनना पड़ता है और जिस रास्ते से कभी शर्म के कारण मुड़ गए थे, उसी रास्ते पर लौटकर साथ चलना पड़ता है।