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‘हनुमान अंश’ की सफलता के बाद पौराणिक फिल्मों पर बढ़ा बॉलीवुड का भरोसा

मुंबई: कम बजट में बनी ‘हनुमान अंश’ की अप्रत्याशित सफलता ने हिंदी फिल्म उद्योग का ध्यान एक बार फिर आस्था और भारतीय पौराणिक कथाओं की ओर खींचा है। नीब करोरी बाबा के जीवन से प्रेरित इस फिल्म ने दिखाया कि सीमित संसाधनों वाली धार्मिक कहानी भी मजबूत प्रस्तुति और दर्शकों से भावनात्मक जुड़ाव के सहारे सिनेमाघरों में लंबी दौड़ लगा सकती है।

इस रुझान के बीच कई नई परियोजनाएं तैयार हो रही हैं। करण जौहर राधा-कृष्ण की कथा पर फिल्म बनाने की तैयारी में बताए जा रहे हैं। संजय मिश्रा ‘तेरा साईं’ में साईं बाबा की भूमिका निभाएंगे, जबकि खाटू श्याम से जुड़ी फिल्म और ‘महाकाव्य श्री रामायण कथा’ भी निर्माण में हैं। रणबीर कपूर की बहुप्रतीक्षित ‘रामायणम्’ दिवाली पर रिलीज होने वाली है और विक्की कौशल से जुड़ी ‘महावतार’ भी इसी बड़े सांस्कृतिक दायरे का हिस्सा है।

दक्षिण भारतीय सिनेमा की ‘हनु मैन’, ‘कांतारा’ और एनिमेशन फिल्म ‘महावतार नरसिम्हा’ जैसी सफलताओं ने पहले ही यह संकेत दे दिया था कि आस्था से जुड़ी कथा को नई तकनीक, प्रभावी दृश्य भाषा और समकालीन कहानी कहने के तरीके से पेश किया जाए तो व्यापक दर्शक मिल सकते हैं। अब हिंदी सिनेमा भी इस संभावना को अधिक गंभीरता से देख रहा है।

फिल्म कारोबार के जानकार इस बदलाव को देश में बढ़ी सांस्कृतिक सक्रियता से जोड़ते हैं। वाराणसी, उज्जैन, अयोध्या, केदारनाथ और सोमनाथ जैसे धार्मिक स्थलों के पुनर्विकास तथा उनसे जुड़ी सार्वजनिक चर्चा ने लोगों को अपनी परंपराओं के प्रति अधिक मुखर बनाया है। हालांकि केवल धार्मिक विषय चुन लेना सफलता की गारंटी नहीं है। कहानी की ईमानदारी, अभिनय, तकनीक और मनोरंजन मूल्य अभी भी निर्णायक हैं।

‘कृष्णावतारम’ के निर्देशक हार्दिक गज्जर का मानना है कि कठिन और नकारात्मक माहौल में आस्था से जुड़ी कहानियां दर्शकों को उम्मीद देती हैं। उनकी योजना त्रयी के अगले हिस्सों में भगवान कृष्ण की जीवन दृष्टि, प्रेम, कर्म और व्यवहार की सीख को सामने लाने की है। निर्माता अगली पीढ़ी, खासकर जेन-जी, तक इन कथाओं को ऐसी भाषा में पहुंचाना चाहते हैं जो उपदेश जैसी न लगे।

‘हनुमान अंश’ की टीम ने भी फिल्म को चमत्कारों की सूची बनाने के बजाय मानवता, समानता और सेवा के संदेश पर केंद्रित किया। निर्माता का कहना है कि विभिन्न धर्मों के दर्शकों ने फिल्म देखी, जिससे यह धारणा मजबूत हुई कि संवेदनशील ढंग से कही गई आध्यात्मिक कथा अपने धार्मिक दायरे से बाहर भी लोगों को छू सकती है।

भारतीय पुराणों, लोक परंपराओं, शक्तिपीठों, ज्योतिर्लिंगों और संत जीवनियों में फिल्मों के लिए कहानियों का बड़ा भंडार है। आने वाले वर्षों में यह जॉनर तेजी से बढ़ सकता है, लेकिन दर्शक अब बड़े नाम से अधिक विश्वसनीयता और गुणवत्ता पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। ‘हनुमान अंश’ का सबसे बड़ा संदेश यही है कि आस्था पर बनी फिल्म तभी टिकती है जब उसके भीतर कथा, संवेदना और सिनेमाई ईमानदारी भी मौजूद हो।