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खाली डिब्बे में रखी हुई रोटी: बराबरी की जगह की मार्मिक कहानी

स्कूल की साझा मेज़ पर भोजन करते अमन और सना

कस्बे के पुराने स्कूल में दो घंटियाँ थीं। पहली घंटी बच्चों को कक्षा में बुलाती थी। दूसरी, दोपहर की छुट्टी वाली, आँगन में इतनी तेज़ सुनाई देती कि बंद खिड़कियों के पीछे बैठे बच्चे भी अपनी कॉपियाँ समेटने लगते। अमन को दूसरी घंटी पसंद थी, क्योंकि उस समय हर डिब्बे से अलग खुशबू निकलती। किसी में पराठे, किसी में नींबू चावल, और किसी में माँ के हाथ का साधारण नमक-तेल लगा रोटी का टुकड़ा होता।

अमन आठवीं में पढ़ता था। उसका टिफ़िन रोज़ भरा रहता था। उसकी माँ अस्पताल की सफ़ाई टीम में काम करती थीं और सुबह की बस पकड़ने से पहले अँधेरे में ही रोटियाँ सेंक देती थीं। अमन कई बार कहता, “इतना मत रखो। दोस्त कुछ न कुछ बाँट देते हैं।” माँ मुस्करा देतीं। “बाँटना अच्छा है, बेटा। पर पहले यह जानना भी अच्छा है कि सामने वाले को क्या चाहिए।” अमन को यह बात तब बहुत सामान्य लगी थी।

उस सोमवार स्कूल में नई छात्रा आई। उसका नाम सना था। वह आँगन के दूसरे सिरे पर बैठती, जहाँ नीम की छाया सबसे देर तक रहती थी। टिफ़िन की घंटी पर वह अपनी पुरानी नीली बोतल निकालती और पानी पीती। बाकी बच्चे खेलते, वह किसी पुस्तक का पन्ना धीरे-धीरे पलटती रहती। अमन ने पहली बार सोचा कि शायद उसे किताबें खाने से ज़्यादा पसंद हैं। फिर उसे याद आया कि वह खुद भी कुछ दिनों में खाना छोड़कर खेलना पसंद करता है। उसने बिना पूछे कोई निष्कर्ष नहीं निकाला।

तीसरे दिन सना की किताब खुली ही रह गई। हवा ने पन्ना पलटा तो भीतर एक छोटी काग़ज़ की पर्ची दिखी—“आज शाम तक दवाई लेना।” अमन ने वह पर्ची नहीं उठाई। किसी और की बात पढ़ लेने में उसे संकोच हुआ। उसने बस इतना देखा कि सना छुट्टी में पानी के अलावा कुछ नहीं निकालती।

अगले दिन अमन ने अपना टिफ़िन थोड़ा जल्दी खोला। दो रोटियाँ, आलू की सूखी सब्ज़ी और एक छोटा केला। उसने सना के पास जाकर पूछा, “मैं नीम के नीचे बैठ सकता हूँ?” सना ने जगह बना दी। अमन ने रोटी आगे नहीं बढ़ाई। पहले उसने पूछा, “तुम्हारी किताब कैसी है?” सना ने बताया कि किताब में एक ऐसी लड़की है जो हर पेड़ का नाम याद रखती है, लेकिन अपना घर बार-बार बदलती है। दोनों कुछ देर किताब के पात्रों पर बात करते रहे। फिर सना ने बोतल से पानी पी लिया और अपनी कॉपी खोल ली।

अमन ने उसी शाम माँ से पूछा, “किसी दोस्त को मदद चाहिए हो तो कैसे पता चले? सीधे पूछने से उसे बुरा भी लग सकता है।” माँ ने चूल्हे से रोटी उतारी। “किसी को ‘बेचारा’ बनाकर मदद मत देना। पूछो कि वह क्या चाहता है। कभी-कभी एक साथ बैठना भी ज़रूरत होती है।” फिर उन्होंने अपनी नौकरी की एक बात कही। अस्पताल में एक बुज़ुर्ग महिला रोज़ इंतज़ार करती थी। बहुत लोग उसे दवा के पैसे देने लगे, लेकिन वह किसी से पैसे नहीं लेती। बाद में पता चला कि उसे बस पर्ची पढ़कर सुनाने वाला कोई चाहिए था। “ज़रूरत समझे बिना दिया हुआ उपहार,” माँ बोलीं, “कभी-कभी बोझ बन जाता है।”

स्कूल के आँगन में तब एक और दृश्य रोज़ होता था। कुछ बच्चे अपने टिफ़िन का बचा खाना कूड़ेदान में डाल देते। एक दिन अमन ने देखा कि दो पूरे पराठे धूल भरी पन्नी में पड़े हैं। उसे माँ की सुबह याद आई—बस से पहले जल्दी में सिकी रोटियाँ और हाथ पर लगे आटे की सफ़ेदी। अमन को लगा कि खाना फेंकने वाले बच्चों को भी शायद उतना नहीं चाहिए था जितना उनके घर से रख दिया गया था। समस्या किसी एक बच्चे की नहीं थी।

वह अपनी कक्षा की अध्यापिका, कविता मैडम, के पास गया। उसने सना का नाम नहीं लिया। बस पूछा, “हम लोग इतना खाना क्यों फेंकते हैं? क्या स्कूल में कोई ऐसा तरीका हो सकता है कि जिसे ज़रूरत हो उसे खाना मिल जाए, और किसी को सबके सामने हाथ न फैलाना पड़े?” कविता मैडम ने ध्यान से सुना। “हो सकता है,” उन्होंने कहा, “पर पहले हमें खाना सुरक्षित रखने और बच्चों की गरिमा दोनों के बारे में सोचना होगा। बचा हुआ खुला भोजन उठाकर किसी को देना सही नहीं। और किसी बच्चे को चिन्ह लगाकर अलग कतार में खड़ा करना भी सही नहीं।”

अगले सप्ताह अध्यापिका ने कक्षा में एक छोटा सवाल रखा: “जब आप टिफ़िन भरते हैं, आपकी भूख कौन जानता है?” कई बच्चों ने हाथ उठाए। कुछ बोले, “हमारी माँ।” किसी ने कहा, “दादी।” एक बच्चा बोला, “कभी-कभी कोई नहीं पूछता।” कक्षा में हँसी हुई, पर कविता मैडम ने उससे अगला सवाल किया, “तो हम घर में यह बात कैसे कहें कि जितना खा सकते हैं उतना ही रखें?” इस पर बच्चों ने अपने-अपने तरीक़े बताए। किसी ने डिब्बे में दो हिस्से बनाने की बात की, किसी ने छोटी रोटी रखने की। पहली बार उस स्कूल में टिफ़िन को सिर्फ खाना नहीं, बातचीत का विषय समझा गया।

स्कूल ने अभिभावकों और रसोई टीम से बात कर एक व्यवस्था शुरू की। जिन परिवारों के लिए दोपहर का भोजन कठिन था, वे कार्यालय में निजी तौर पर बात कर सकते थे। विद्यालय ने उपलब्ध सहायता की जानकारी सबको एक ही पर्ची पर दी, किसी बच्चे का नाम अलग से नहीं पुकारा। दोपहर में एक साझा मेज़ पर स्कूल की रसोई से तैयार भोजन रखा जाता, जहाँ कोई भी बच्चा अपना टिफ़िन साथ लेकर बैठ सकता था। घर से आया खुला बचा खाना वहाँ नहीं रखा जाता। कुछ माता-पिता ने नियमित सहायता के लिए योगदान दिया, और प्रधानाध्यापक ने साफ़ कहा कि कोई बच्चा दान देने या लेने वाला कहलाकर पहचाना नहीं जाएगा।

अमन को लगा कि यह काम हो गया। पर असली परीक्षा तब आई जब साझा मेज़ पर दो दिन तक कोई नहीं बैठा। बच्चे एक-दूसरे की निगाहें पढ़ रहे थे। “वहाँ बैठेंगे तो सब समझेंगे कि हमारे पास खाना नहीं है,” एक लड़के ने धीमे से कहा। कविता मैडम ने कोई घोषणा नहीं की। तीसरे दिन वह अपना टिफ़िन लेकर उसी मेज़ पर बैठ गईं। उन्होंने रसोई की खिचड़ी का एक छोटा कटोरा भी लिया। फिर इतिहास के शिक्षक आ गए। उन्होंने कहा, “मुझे घर से रोटी मिली है, पर यह खिचड़ी भी अच्छी लग रही है।” कुछ मिनट बाद अमन और उसके दो दोस्त बैठ गए। किसी ने पूछा नहीं कि कौन किसलिए आया है। धीरे-धीरे वह मेज़ स्कूल की सामान्य जगह बन गई।

सना उस दिन भी नीम के नीचे थी। अमन ने उसके पास जाकर कहा, “आज हम लोग सामने वाली मेज़ पर बैठे हैं। किताब लेकर आओगी? तुमने जिस पेड़ वाले अध्याय की बात की थी, वह मुझे सुनना है।” सना ने पहले झिझककर पूछा, “वहाँ सबके सामने?” अमन बोला, “वहाँ सबके सामने खाना नहीं, कहानी भी है।” उसने उसे खींचा नहीं। बस इंतज़ार किया। थोड़ी देर बाद सना किताब लेकर आई और एक खाली कुर्सी पर बैठ गई। रसोई की महिला ने सभी बच्चों से एक जैसा पूछा, “खिचड़ी चाहिए?” सना ने हाँ कहा। उसने पहला कौर इतना धीरे खाया कि अमन ने नज़र फेर ली। किसी की भूख को तमाशा नहीं बनाना चाहिए, उसे माँ की बात याद आई।

कुछ दिन बाद सना ने खुद बताया कि उसके पिता पहले इमारतों में खिड़कियाँ लगाते थे। एक दुर्घटना के बाद कई महीनों से काम नियमित नहीं था। उसकी माँ ने सिलाई लेना शुरू किया था, पर हर सप्ताह अलग पता, अलग भुगतान और अलग चिंता होती। सना इस स्कूल में इसलिए आई थी कि नया कमरा किराए पर मिला था। वह अपनी कहानी बताते-बताते रुकी। “तुम किसी को मत बताना,” उसने कहा। अमन ने सिर हिलाया। उसने पूछा भी नहीं कि दुर्घटना कैसे हुई थी। किसी का भरोसा पूरी घटना सुनने का अधिकार नहीं देता।

उस वर्ष विद्यालय में ‘भोजन का हिसाब’ नाम की गतिविधि रखी गई। यह नाम अमन ने सुझाया था। बच्चे एक सप्ताह तक लिखते कि अपने डिब्बे में कितना खाना लाए, कितना खाया और कितना बिना छुए रह गया। किसी के नाम से परिणाम दीवार पर नहीं लगे। कक्षा ने बस कुल आँकड़े देखे। कई बच्चों को पहली बार पता चला कि रोज़ थोड़ा-थोड़ा बचने पर सप्ताह भर में बहुत खाना फेंका जाता है। वे घर गए और बोले, “मुझसे पूछकर डिब्बा भरना।” कुछ परिवारों ने बच्चों की बात सुनी; कुछ में धीरे-धीरे बदलाव आया। स्कूल ने भोजन बचाने को किसी बच्चे के अच्छे या बुरे होने का फैसला नहीं बनाया।

एक शाम अमन की माँ लौटते समय अपना कपड़े का बैग आँगन में रखकर बैठ गईं। वह बहुत थकी थीं। अमन ने पानी दिया और स्कूल की व्यवस्था के बारे में बताया। माँ ने पूछा, “तुमने सना से पूछा कि उसे क्या चाहिए?” अमन ने कहा, “पहले हम दोस्त बने। उसने अपनी बात तब बताई जब उसे ठीक लगा। और स्कूल ने ऐसी मेज़ बनाई जहाँ उसे अकेले खड़ा नहीं होना पड़ा।” माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा। “तो तुमने मदद से पहले बराबरी चुनी,” उन्होंने कहा। अमन ने पहली बार महसूस किया कि यह कोई बड़ी पंक्ति नहीं, एक रोज़ की आदत है।

महीने के अंत में सना की माँ स्कूल आईं। वह किसी से सहायता लेने की बात करने आई थीं, पर जब रसोई टीम से मिलीं तो बोलीं, “मैं सिलाई जानती हूँ। भोजन की मेज़ के लिए कपड़े के साफ़ कवर बना सकती हूँ। क्या काम मिलेगा?” प्रधानाध्यापक ने उनसे काम की शर्तें और भुगतान स्पष्ट किए। किसी ने उन्हें यह नहीं कहा कि सहायता के बदले काम करना पड़ेगा। उन्होंने काम चुना, इसलिए उन्हें काम के पैसे मिले। अमन ने उस दिन पहली बार समझा कि गरिमा का मतलब केवल नम्र भाषा नहीं; उचित भुगतान और स्पष्ट विकल्प भी हैं।

साझा मेज़ पर अब साफ़ नीला कवर था। उसके एक कोने पर सना की माँ ने छोटा पीला सूरज सिला था। सना उसे देखकर मुस्कराती, मगर किसी को यह नहीं बताती कि सिलाई किसने की। उस रहस्य में शर्म नहीं थी; वह अपने परिवार की कहानी पर अपना अधिकार रखती थी।

एक शनिवार विद्यालय में पुराने सामान की मरम्मत का छोटा मेला लगा। सना की माँ ने फटे बैगों की सिलाई समझाई, और अमन की माँ ने बच्चों को बताया कि अस्पताल में सफ़ाई का काम भी लोगों की देखभाल का हिस्सा है। सना के पिता, जो अभी लंबे समय तक खड़े नहीं रह पाते थे, बच्चों को खिड़की का ढीला कब्ज़ा पहचानना सिखाने आए। उन्होंने किसी से अपनी कठिनाई छिपाई नहीं, पर उस दिन उनकी पहचान केवल दुर्घटना से भी नहीं बनी। बच्चे उन्हें ध्यान से सुन रहे थे। अमन ने देखा कि किसी व्यक्ति के पास मदद माँगने की ज़रूरत और दूसरों को कुछ सिखाने का हुनर एक साथ हो सकते हैं।

मेला ख़त्म होने के बाद सना के पिता ने प्रधानाध्यापक से पूछा, “क्या विद्यालय की टूटी कुर्सियों की जाँच के लिए मुझे काम मिल सकता है? मैं जितना कर सकूँगा उतना ही बताऊँगा।” प्रधानाध्यापक ने काम तय करने से पहले उनसे पूछा कि कौन-सा हिस्सा उनकी सेहत के अनुकूल है। उन्होंने भारी कुर्सियाँ उठाने का काम किसी और को दिया और निरीक्षण का भुगतान तय किया। सना ने अपने पिता को कुर्सियों के नीचे झुकते देखा तो दौड़कर उनका औज़ार पकड़ लिया। पिता मुस्कराए, “मुझे मदद चाहिए तो मैं कहूँगा। आज तुम अपनी किताब पढ़ो।” सना ने पहली बार किसी को यह कहते सुना कि सहायता और स्वतंत्रता दोनों साथ रह सकती हैं।

सर्दियों की शुरुआत में अमन के टिफ़िन में केवल एक रोटी थी। माँ उस सुबह अस्पताल में देर तक रुकने के कारण घर आकर सो गई थीं। अमन ने उन्हें जगाया नहीं। स्कूल में उसने साझा मेज़ पर बैठकर खिचड़ी ली। सना ने अपनी किताब खोली और पूछा, “आज घर से थोड़ा कम लाए?” अमन हँस दिया। “हाँ, आज मुझे भी यहाँ की खिचड़ी चाहिए।” सना ने बिना दया के कहा, “फिर तो जल्दी खाओ, नहीं तो मैं पेड़ वाला नया अध्याय शुरू कर दूँगी।”

दूसरी घंटी बज चुकी थी। आँगन में बच्चे उठने लगे। अमन ने खाली डिब्बा बंद किया। उसे लगा कि यह डिब्बा खाली होने से छोटा नहीं हुआ। उसमें माँ के हाथ की मेहनत की याद थी, साझा भोजन का स्वाद था, और एक दोस्त के साथ बिना सवाल पूछे बैठ सकने की जगह थी। उसने उस दिन अपनी कॉपी के आख़िरी पन्ने पर लिखा: “रोटी की क़ीमत उसके टुकड़े गिनने से नहीं समझ आती। जब हम किसी को बराबरी से बैठने की जगह देते हैं, तब वह सचमुच साझा होती है।”