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राजौरी के पहाड़ों में अखरोट से आय और मजदूरी, किसानों ने भंडारण की सुविधा माँगी

राजौरी के पहाड़ी क्षेत्र में अखरोट के पेड़ और फलों की टोकरी, सांकेतिक दृश्य

राजौरी, 14 सितंबर 2026। जम्मू-कश्मीर के कोटरांका और बुधाल के पहाड़ी क्षेत्रों में अखरोट बागवानी कई परिवारों की आय का सहारा है। बागवानी विभाग किसानों को बेहतर पौधों और खेती की जानकारी देने के लिए शिविर आयोजित कर रहा है। स्थानीय किसान और कारोबारी बताते हैं कि फसल से बिक्री के साथ तुड़ाई, छंटाई और ढुलाई में भी काम मिलता है। हालांकि किसी पूरे जिले की पैदावार या किसान की तय कमाई का विश्वसनीय आँकड़ा अभी उपलब्ध नहीं है।

बुधाल की नर्सरी में ग्राफ्टेड पौधे

बुधाल नर्सरी के तकनीशियन अज़हर महमूद के अनुसार यह नर्सरी 1978 से चल रही है। यहाँ अखरोट के साथ सेब और आड़ू के पौधे तैयार किए जाते हैं। ग्राफ्टेड अखरोट और आड़ू के पौधों पर भी काम हो रहा है। बागवानी विभाग के फील्ड टेक्नीशियन वली मोहम्मद ने बताया कि किसानों को किस्मों और तकनीक के बारे में जागरूकता शिविरों से जानकारी दी जा रही है। पौधों पर सहायता किस शर्त पर मिलती है, यह किसान स्थानीय विभाग से पुष्टि करके ही आवेदन करें।

किसान और कारोबारी क्या बता रहे हैं

किसान शमशेर अहमद के मुताबिक अखरोट राजौरी की प्रमुख फसलों में है और इसे ‘एक जिला एक उत्पाद’ के तहत बढ़ावा मिलता है। उनका कहना है कि किसान सेब की अधिक घनत्व वाली बागवानी की ओर भी बढ़ रहे हैं, लेकिन पहाड़ी इलाकों में अखरोट का महत्व बना हुआ है। स्थानीय ठेकेदार शकूर ने बताया कि कुछ परिवारों की जमीन पर चार-पाँच पेड़ भी आजीविका में योगदान देते हैं। यह अनुभव है, सभी बागों के लिए समान आय की गारंटी नहीं।

भंडारण और पानी की सुविधा की माँग

फलनी गांव के कारोबारी मोहम्मद शब्बीर ने कहा कि वे लगभग तीन दशकों से अखरोट व्यापार से जुड़े हैं और उनके कारोबार में 500–600 लोगों को काम मिलता है। इस संख्या को पूरे जिले के रोजगार का आँकड़ा नहीं समझना चाहिए। उन्होंने कोल्ड स्टोरेज और पानी की टंकी की कमी बताई है। बेहतर भंडारण से किसानों को फसल जल्दी बेचने का दबाव कम हो सकता है, लेकिन इसका असर उपलब्ध सुविधा, गुणवत्ता और बाजार भाव पर निर्भर करेगा। किसानों के लिए पौधे चुनने से पहले अपने इलाके की ऊँचाई, पानी और विभागीय सलाह देखना जरूरी है।