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750 से ज्यादा फिल्मों के बाद भी गरीबी का डर नहीं गया, रवि किशन ने सुनाई संघर्ष की कहानी

अभिनेता रवि किशन ने अपनी कामयाबी के पीछे छिपे उस डर के बारे में खुलकर बात की है, जो गरीबी से निकलने के दशकों बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ता। कई भाषाओं की 750 से ज्यादा फिल्मों, लोकप्रिय वेब परियोजनाओं और सार्वजनिक जीवन में लंबी पारी के बावजूद वे आज भी महंगे होटल में अपने लिए खर्च करने से हिचकते हैं। उनका कहना है कि सात सितारा होटल में भी वे अक्सर सादा खिचड़ी ही मंगाते हैं।

बचपन की तंगी ने छोड़ी गहरी छाप

रवि किशन का जन्म मुंबई में हुआ, लेकिन उनका बचपन उत्तर प्रदेश के जौनपुर में बीता। परिवार की आर्थिक हालत कमजोर थी। उन्होंने याद किया कि घर में कभी एक ही बर्तन में बनी खिचड़ी बारह लोगों के बीच बांटी जाती थी और सबका पेट भर सके, इसके लिए उसमें पानी बढ़ाया जाता था। खेती से जुड़ा परिवार कर्ज और जिम्मेदारियों से जूझ रहा था। इन परिस्थितियों ने उनके भीतर पैसे की कीमत और अभाव का डर बहुत कम उम्र में बैठा दिया।

अभिनय का आकर्षण उन्हें बचपन से था। गांव की रामलीला में वे सीता की भूमिका निभाते थे, लेकिन उनके पिता इस इच्छा के खिलाफ थे। किशोर उम्र में घर का विरोध बढ़ा तो मां ने उन्हें 500 रुपये देकर मुंबई जाने में मदद की। नए शहर में न कोई फिल्मी संपर्क था और न रहने-खाने की पक्की व्यवस्था। उन्होंने लंबे समय तक छोटी भूमिकाओं, ऑडिशन और इंतजार के बीच अपना रास्ता बनाया।

हिंदी फिल्मों में लंबा संघर्ष

रवि किशन ने 1990 के दशक में हिंदी फिल्मों से शुरुआत की। काम मिलता रहा, मगर वह पहचान और मेहनताना देर से मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी। वे बताते हैं कि करियर के शुरुआती करीब पंद्रह वर्षों में कई बार अपमान और निराशा झेलनी पड़ी। फिर भी उन्होंने भूमिकाओं की लंबाई से ज्यादा काम के अवसर को महत्व दिया।

‘तेरे नाम’ में पंडित रमेश्वर का किरदार उनके हिंदी फिल्म करियर का अहम मोड़ बना। छोटी अवधि के बावजूद भूमिका दर्शकों को याद रही। आगे चलकर उन्होंने ‘फिर हेरा फेरी’, ‘वेलकम टू सज्जनपुर’, ‘तनु वेड्स मनु’, ‘मुक्केबाज’ और ‘बटला हाउस’ जैसी फिल्मों में अलग-अलग तरह के पात्र निभाए। वे केवल नायक की छवि से बंधे रहने के बजाय सहायक, नकारात्मक और चरित्र भूमिकाओं के लिए भी तैयार रहे।

भोजपुरी सिनेमा ने बदली दिशा

साल 2003 में ‘सैयां हमार’ से भोजपुरी सिनेमा में कदम रखना उनके करियर का निर्णायक मोड़ बना। शुरुआती संकोच के बाद उन्होंने इस क्षेत्र को अपनाया और जल्दी ही बड़ा दर्शक वर्ग मिला। भोजपुरी फिल्मों की लोकप्रियता ने उन्हें वह स्टार पहचान दी, जिसके लिए वे हिंदी सिनेमा में लंबे समय से संघर्ष कर रहे थे।

इसके बाद उन्होंने हिंदी और भोजपुरी के साथ तेलुगु, तमिल और कन्नड़ फिल्मों में भी काम किया। वे कई भाषाओं में 750 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय करने का दावा करते हैं। टीवी और डिजिटल मंचों ने भी उनकी अभिनय सीमा को नया विस्तार दिया। ‘मामला लीगल है’ में वीडी त्यागी और ‘लापता लेडीज’ में पुलिस अधिकारी श्याम मनोहर जैसे किरदारों ने नई पीढ़ी के दर्शकों के बीच उनकी पहचान मजबूत की।

सफलता मिली, आदतें नहीं बदलीं

रवि किशन का कहना है कि आर्थिक सुरक्षा मिलने के बाद भी उनके भीतर का संघर्षरत लड़का पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। महंगे होटल में अच्छा भोजन मंगाने, कपड़े लॉन्ड्री में देने या अपने लिए महंगी वस्तुएं खरीदने में उन्हें संकोच होता है। पत्नी और बच्चे उनके लिए फोन, कपड़े और जूते खरीदते हैं, जबकि परिवार की जरूरतों पर खर्च करते समय वे ज्यादा सहज महसूस करते हैं।

उनके मुताबिक बचपन की कमी केवल याद नहीं रहती, वह निर्णय लेने का तरीका भी बदल देती है। इसी कारण सफलता के बाद भी वे सादगी को पकड़े हुए हैं। वे अपमान और असफलता को कड़वाहट का कारण मानने के बजाय मजबूत बनने की प्रक्रिया बताते हैं।

सिनेमा से संसद तक

फिल्मों के बाद रवि किशन ने राजनीति में कदम रखा। साल 2014 में जौनपुर से पहला लोकसभा चुनाव हारने के बाद वे 2017 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। 2019 में गोरखपुर से लोकसभा पहुंचे और 2024 में लगातार दूसरी बार इसी सीट से चुने गए।

उनकी यात्रा मिट्टी के घर, सीमित भोजन और अनिश्चित रोजी से शुरू होकर भोजपुरी स्टारडम, हिंदी सिनेमा, ओटीटी और संसद तक पहुंची। फिर भी वे मानते हैं कि संघर्ष को भूलना नहीं चाहिए, क्योंकि वही इंसान को काम और अवसर के प्रति सजग बनाए रखता है।