छोटे से गांव में राघव नाम का बालक रहता था। उसके घर में बिजली नहीं थी, फिर भी वह पढ़ने का सपना देखता था। हर शाम वह चौपाल के पास लगे पुराने दीपक के नीचे बैठता।
लोग कहते थे कि पढ़ाई गरीबों के लिए नहीं होती। राघव ने यह बात अपने मन में जगह नहीं बनाने दी। उसकी मां ने घर के बचे तेल से छोटा दीपक बनाया और कहा कि रोशनी कम हो तो आंखें मेहनत करें, सपना नहीं रुके।
एक दिन बारिश में चौपाल का दीपक बुझ गया। राघव ने बच्चों को अपने घर बुलाया और सबने मिलकर मिट्टी के दीये जलाए। उसने तय किया कि गांव में हर बच्चे के लिए पढ़ने का समय होगा।
शुरुआत में केवल तीन बच्चे आए। राघव ने उन्हें अक्षर, गिनती और साफ लिखना सिखाया। जो बच्चा पहले दिन अनुपस्थित रहता, वह अगले दिन उसके घर जाकर कारण पूछता।
धीरे-धीरे किसान, दुकानदार और बुजुर्ग भी जुड़ने लगे। किसी ने पुरानी किताबें दीं, किसी ने चटाई, किसी ने तेल। ज्ञान बांटने से कम नहीं हुआ, गांव का भरोसा बढ़ता गया।
कई महीनों बाद गांव की पहली परीक्षा हुई। बच्चों ने अच्छे अंक पाए। सबसे बड़ी खुशी तब हुई जब राघव की मां ने अपना नाम खुद लिखकर दिखाया।
राघव ने समझा कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, अपने निर्णय खुद लेने की ताकत है। अब गांव में हर घर में शाम का एक घंटा पढ़ाई के लिए रखा जाता है।
इस कहानी की सीख है कि साधन कम हों तो सहयोग बढ़ाया जा सकता है। एक छोटी रोशनी भी रास्ता दिखाती है, अगर उसे दूसरों तक पहुंचाने का साहस हो।

