सोलन, 12 सितंबर 2026। कसौली की एक डिस्टिलरी से जुड़े मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने केंद्र के जल शक्ति मंत्रालय से प्राकृतिक झरने के पानी के औद्योगिक उपयोग के नियमन पर विचार करके नया जवाब देने को कहा है। 21 अगस्त के आदेश में अधिकरण ने कहा कि हिमाचल प्रदेश का भूजल कानून झरनों से निकलने वाले पानी को भी भूजल की परिभाषा में रखता है, जबकि केंद्रीय भूजल प्राधिकरण के मौजूदा दिशानिर्देश प्राकृतिक बहते झरने को अपने दायरे में नहीं मानते। केंद्र को इस अंतर पर अपना निर्णय स्पष्ट करना है। यह अभी नियमन लागू करने का अंतिम आदेश नहीं है।
राज्य भूजल प्राधिकरण को भी पक्षकार बनाया
मामला कसौली डिस्टिलरी के संबंध में 2023 की शिकायत से शुरू हुआ था। संयुक्त समिति की रिपोर्ट के अनुसार परिसर में एक बोरवेल है और झरने का पानी भी इस्तेमाल होता है, लेकिन उसके उपयोग की लॉगबुक नहीं रखी गई थी। कंपनी के वकील ने अधिकरण को बताया कि झरने के पानी पर रॉयल्टी चुकाई जा रही है। राज्य भूजल प्राधिकरण ने पहले प्राकृतिक झरने के पंजीकरण की जरूरत नहीं बताई थी। NGT ने यह स्पष्ट करने के लिए प्राधिकरण को मामले में पक्षकार बनाया है कि बिना पंजीकरण राज्य कानून की रॉयल्टी और जल-मापन संबंधी धाराओं का पालन कैसे सुनिश्चित होगा। अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को निर्धारित है।