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सीहोर में सोयाबीन खेतों तक पहुंचे वैज्ञानिक, 148 किसानों को प्रशिक्षण; नए केंद्र पर काम जारी

सोयाबीन के खेत में किसानों को फसल की जानकारी देता विशेषज्ञ का सांकेतिक दृश्य

सीहोर, 12 सितंबर 2026। जिले के भाऊखेड़ी गांव में आयोजित सोयाबीन दिवस और किसान प्रशिक्षण में लगभग 148 किसानों ने वैज्ञानिकों से फसल प्रबंधन पर चर्चा की। इंदौर के राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान की टीम ने खेतों में लगे प्रदर्शन प्लॉट भी देखे। गांव में प्रस्तावित कृषि विज्ञान केंद्र की तैयारी इस कार्यक्रम का दूसरा अहम पहलू रही, लेकिन केंद्र के नियमित संचालन की तारीख अभी घोषित नहीं हुई है।

प्रदर्शन खेतों में क्या देखा गया

संस्थान के निदेशक डॉ. के. ए. सिंह ने भाऊखेड़ी और आसपास के खेतों में सोयाबीन की NRC 150 और JS 21-72 किस्मों वाले प्लॉटों का निरीक्षण किया। आयोजन में शामिल किसानों ने इन खेतों से लगभग 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज की उम्मीद जताई। यह किसानों का अनुमान है, मापी गई अंतिम पैदावार नहीं; मौसम, मिट्टी, रोग और खेत प्रबंधन के हिसाब से वास्तविक उपज अलग होगी। वैज्ञानिकों ने किस्म, खरपतवार और उत्पादन तकनीक पर प्रश्नों के जवाब दिए।

प्रशिक्षण में इंदौर के सोयाबीन वैज्ञानिकों के साथ जबलपुर के खरपतवार अनुसंधान निदेशालय के विशेषज्ञ भी शामिल थे। ऐसे खेत-आधारित सत्रों में किसान अपनी फसल के लक्षण सीधे दिखाकर सलाह ले सकते हैं। किसी भी दवा या छिड़काव का चुनाव रोग या खरपतवार की सही पहचान और स्थानीय कृषि अधिकारी की सिफारिश के बाद ही करना चाहिए।

भाऊखेड़ी केंद्र किस चरण में है

राजस्व मंत्री करन सिंह वर्मा ने प्रस्तावित कृषि विज्ञान केंद्र से क्षेत्रीय किसानों को प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीक मिलने की उम्मीद जताई। कार्यक्रम में जिला प्रशासन ने चिन्हित भूमि के हस्तांतरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात कही। राज्य ने अगस्त में भाऊखेड़ी में संस्थान के काम के लिए लगभग 20 हेक्टेयर भूमि आवंटित करने का निर्णय लिया था। भूमि आवंटन या सर्वे पूरा केंद्र खुल जाने के बराबर नहीं है।

केंद्र शुरू होने पर क्षेत्र के किसानों के लिए सोयाबीन की किस्मों, कीट-रोग प्रबंधन और फसल विविधीकरण पर स्थानीय मार्गदर्शन उपलब्ध हो सकता है। तब तक किसान जिले के वर्तमान कृषि कार्यालय और उपलब्ध वैज्ञानिक परामर्श सेवाओं का उपयोग करें। मध्य प्रदेश का ताजा मौसम अनुमान देखकर खेत में कटाई, दवा और जल निकासी की योजना बनाएं; जिला चेतावनी को प्राथमिकता दें।