छोटे से गांव में राघव नाम का बालक रहता था। उसके घर में बिजली नहीं थी, फिर भी वह पढ़ने का सपना देखता था। हर शाम वह चौपाल के पास लगे पुराने दीपक के नीचे बैठता। लोग कहते थे कि पढ़ाई गरीबों के लिए नहीं होती। राघव ने यह बात अपने मन में जगह नहीं […]
कस्बे के पुराने स्कूल में दो घंटियाँ थीं। पहली घंटी बच्चों को कक्षा में बुलाती थी। दूसरी, दोपहर की छुट्टी वाली, आँगन में इतनी तेज़ सुनाई देती कि बंद खिड़कियों के पीछे बैठे बच्चे भी अपनी कॉपियाँ समेटने लगते। अमन को दूसरी घंटी पसंद थी, क्योंकि उस समय हर डिब्बे से अलग खुशबू निकलती। किसी […]
नवलपुर में मई की दोपहर इतनी तपती थी कि स्कूल की नीली दीवारें भी गरम लगती थीं। दसवीं की छात्रा मिताली परीक्षा के बाद जल्दी घर जाना चाहती थी। गेट पर उसके पिता महावीर पानी की टूटी टोंटी कस रहे थे। उनकी कमीज़ की बाँह गीली थी और हाथ पर पुराने औज़ारों के निशान थे। […]
बरसात के बाद की वह सुबह पहाड़ी गाँव देवपुर में असामान्य रूप से साफ थी। बस अड्डे के पास रामदीन अपनी छोटी-सी मोची की दुकान खोल रहे थे। चमड़े के पुराने टुकड़े, धागे की रील, हथौड़ी और लोहे की छोटी कीलें उन्होंने हमेशा की तरह करीने से रखीं। उनकी बेटी मीरा स्कूल जाने से पहले […]
जिस दिन हस्ताक्षर की जगह अंगूठा लगा धूपगढ़ के छोटे कस्बे में डाकखाने के पीछे एक घर था, जिसकी छत बारिश में टपकती और गर्मी में तवे जैसी तपती थी। उसी घर में तारा अपनी माँ सुशीला, पिता मोहन और छोटी बहन चंदा के साथ रहती थी। मोहन बस अड्डे पर चाय बेचते थे। सुशीला […]
मौलिक काल्पनिक कहानी — 11 सितंबर नगर परिषद के लिफाफे पर लगी लाल मुहर देखकर देव ने सबसे पहले तारीख गिनी। खाली करने के लिए बाईस दिन थे। इतने में दुकान का सामान बिक सकता था, मकान के बंटवारे के कागज पूरे हो सकते थे और वह सोमवार तक शहर की नौकरी पर लौट सकता […]
यह एक मौलिक काल्पनिक कहानी है। अम्मा की तेरहवीं के अगले दिन निखिल ने तय किया कि वह शाम की बस से शहर लौट जाएगा। दफ्तर से लगातार फोन आ रहे थे। मकान का सामान समेटने के लिए उसने एक कबाड़ी बुला लिया था। लोहे का संदूक, पीतल की पुरानी थाली, बिना जोड़ी की कुर्सियाँ—जो […]